अभी हाल ही में हैदराबाद के सांसद ओवैसी ने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने से

नकार कर दिया। उन्होंने इस बात का हवाला भी दिया कि ऐसी किसी बात का वर्णन संविधान में नहीं किया गया है। यह बात सही है कि उन्हें ऐसा करने लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या केवल इसी कारण से वह चुनचुनकर हर ऐसा कार्य करेंगे, जिससे राष्ट्रवाद की भावना को ठेस पहुंचे?

शायद ओवैसी जैसे लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनका शब्दश: उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन उसकी व्याख्या में कई बातें निहित होती हैं। उदाहरणस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 21 में ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिसका प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन समयसमय पर न्यायालय ने उसकी व्याख्या के द्वारा उसका क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत कर दिया है। जैसेएकान्तता का अधिकार, जीविकोपार्जन का अधिकार आदि।

उसी प्रकार, संविधान के भाग 4(A) में मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था की गई है, जिसके अनुच्छेद 51(A)- b के प्रावधान के अनुसार राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखने तथा उसका पालन करने की बात की गई है।

अगर देखा जाए तो ‘भारत माता की जय’ राष्ट्रीय आंदोलन से ही जुड़ा हुआ एक आदर्श है, और यह इसी मौलिक कर्तव्य के अंतर्गत आता है। यह ठीक है कि मौलिक कर्तव्य होने के नाते इसका पालन न करने पर सजा का प्रावधान नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि ओवैसी जैसे लोग इस मौलिक कर्तव्य का विरोध करें। राष्ट्र का सम्मान करना कब से विरोध की वस्तु बन गया?

अकेले ओवैसी ही इस तरह के कार्य नहीं कर रहे हैं। इसी तरह कन्हैया ने भी जेल से बाहर आते ही फिर से आग उगलना शुरू कर दिया और उसे हमारे देशभक्त जवान, बलात्कारी नजर आने लगे।

उसी तरह हार्दिक पटेल ने भी सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने के लिए उकसाने और देश विरोधी गतिविधियों को संचालित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिलहाल राष्ट्रद्रोह के आरोप में वह अभी जेल में है, जो कि उचित ही है।

दरअसल ओवैसी, उमर खालिद, कन्हैया, हार्दिक पटेल ये सभी एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं, जो कि अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं। इस कारण से सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के प्रयास में ये लोग ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो कई बार शर्मसार करनेवाली हैं। इन्हें ऐसा करने में राष्ट्रवादी भावना को क्षति पहुंचाने वाले कार्यों को करने से भी कोई परहेज नहीं है। हालांकि ये अकेले नहीं हैं, इनके पीछे कई ऐसे बड़े दल और उनके नेता भी शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि वे इससे कुछ फायदा उठा सकते हैं।

इन्हें लगता है कि ऐसी ओछी हरकतें करने और जाति, समूह अथवा संप्रदाय विशेष को भड़काने के द्वारा राजनीतिक लाभ हासिल किया जा सकता है। शायद ऐसे लोग देश की राष्ट्रवादी भावना और उसके नागरिकों के मानसिक स्तर को कमतर आंक रहे हैं।

देश के जागरूक नागरिक उनकी इस अपवित्र मंशा को कभी पूरा नहीं होने देंगे। जो लोग महत्वाकांक्षी हैं, उन्हें चाहिए कि कुछ बेहतर कार्य करें। जिस देश की धरती का अन्न खा रहे हैं, उसके साथ वफादारी करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें देश की जनता सबक अवश्य सिखाएगी।

  • शशिधर उपाध्याय