भारत ने वर्ष 1974 में शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण किए, पूरी दुनिया में खलबली मच गई। इसकी एक बड़ी प्रतिक्रिया हुई, फलस्वरूप NSG अस्तित्व में आया। अब समय बदल चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी सदस्यता के लिए दावेदारी कर दी, और पूरी दुनिया में एक बार फिर से भारत के इस कदम से हलचल बढ़ गई।

NSG की सदस्यता का मिलना या न मिलना उतना मायने नहीं रखता है, जितना यह कि एक देश के तौर पर भारत आज उस स्थिति में है, जहां पर वो दुनिया की महतत्वपूर्ण ताकतों के सामने खड़ा है, और उन्हें चुनौती पेश कर रहा है।

कभी जो अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगा चुका है, आज वही भारत का समर्थन करने के लिए आतुर है। भले ही लोग इस मामले में यह तर्क दें, कि चीन को संतुलित करने के लिए वह ऐसा कर रहा है। लेकिन इसकी वजह कुछ और भी है।

दरअसल इस मंदी के दौर में भारत एक मजबूत स्थिति की तरफ बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अमेरिकी दौरे किए जाने से वहां के निवेशकों में बहुत भरोसा भी उत्पन्न हुआ है। इस दौर में अमेरिका को भी भारत के रूप में एक आर्थिक साझेदार की जरूरत है। ऐसे में भारत के समर्थन से अमेरिका उस रिश्ते को और मजबूत करना चाहता है।

दूसरी तरफ चीन है, जो मंदी के दौर से गुजर रहा है, और अपने हितों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में अपना दबदबा बरकरार रखना चाहता है। वह भारत की ताकत को किसी भी तरीके से बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है। साथ ही वह अपने सहयोगी पाकिस्तान को भी खुश रखना चाहता है। इसलिए उसने विरोध का रास्ता अपनाया हुआ है।

हालांकि NSG के 48 सदस्य देशों में से 40 सदस्य देशों का समर्थन हासिल करके भारत ने अपनी कूटनीतिक ताकत दिखा दी है। वहीं MTCR की सदस्यता के मसले पर जहां चीन को मुंह की खानी पड़ी है, और वर्ष 2004 से उसका मामला अटका पड़ा है, भारत ने उसे हासिल कर लिया है, और यह साबित कर दिया है कि वह कई मसलों पर चीन से आगे बढ़ सकता है, और बढ़ भी रहा है।

रक्षा विशेषज्ञ इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि दुनिया की सैन्य परिस्थितियों को देखते हुए मिसाइल टैक्नोलॉजी का विकसित होना बहुत आवश्यक है, और इस दृष्टिकोण से MTCR की सदस्यता कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

NSG एक ऐसा कूटनीतिक दांव है, जिसके माध्यम से दुनिया का भारत के प्रति बदलता हुआ नजरिया सामने आया है। चाहे भारत के प्रति भय के कारण चीन के द्वारा उसका विरोध करने की बात हो, या फिर उसकी अर्थव्यवस्था से लाभ उठाने की लालसा में उसका समर्थन करने की अमेरिकी आतुरता हो। लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में एक बात तो जाहिर है– ‘दुनिया की दो महाशक्तियों के द्वारा विरोध और समर्थन वर्तमान भारत की अभूतपूर्व शक्ति और प्रभाव को ही दर्शाता है।’

शशिधर उपाध्याय